Raj Kumar Modi Sahibganj
*वाह री जिंदगी*
""”"""""""""""""""'""""
* शमशान के बाहर लिखा था *
* मंजिल तो तेरी ये ही थी *
* बस जिंदगी बित गई आते आते *
* क्या मिला तुझे इस दुनिया से *
* अपनो ने ही जला दिया तुझे जाते जाते *
*वाह री जिंदगी*
""”"""""""""""""""'"वाह री जिंदगी*
""”"""""""""""""""'""""
* दौलत की भूख ऐसी लगी की कमाने निकल गए *
* ओर जब दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए *
* बच्चो के साथ रहने की फुरसत ना मिल सकी *
* ओर जब फुरसत मिली तो बच्चे कमाने निकल गए *
*वाह री जिंदगी*
इश्क का समंदर भी क्या समंदर है.. जो डूब गया वो आशिक... जो बच गया वो _दीवाना_.. जो तैरता ही रह गया वह पति
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें